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ईद-उल–ज़ुहा (बकरीद) : कुर्बानी, त्याग और समर्पण का पर्व

Eid-Ul_Zuha : Eid Mubarak
Eid-Ul-Zuha : Eid Mubarak

Hello Dear Friends,

ईद मुस्लिम धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। जिसे भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस्लाम मजहब के अनुसार मुस्लिम भाइयों द्वारा दो ईदें त्योहार के रूप में मनाई जाती हैं। एक है “ईद-उल-फित्र”, जो रमज़ान के महीने की आखिरी रात चांद रात के रूप में मनाई जाती है। चांद रात में ईद का चांद देखकर मुसलमान अगले दिन “ईद-उल-फित्र” मनाते हैं। इसे मीठी ईद भी कहते हैं। दूसरी है “ईद-उल-ज़ुहा”, जिसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन धार्मिक मर्यादाओं के अनुसार बकरे की कुर्बानी दी जाती है। वर्ष भर में इस्लाम धर्म में ये दो ऐसे त्यौहार आते हैं, जो सभी में हर्षोल्लास भर देते हैं।

ईद-उल-जुहा (Eid Ul-Zuha) –

इस साल ईद-उल-जुहा (Eid Ul-Zuha) का त्यौहार 13 सितम्बर 2016 यानी आज ही के दिन मनाया जायेगा। यह हर साल मुस्लिम माह जुल-हिज्जा के दसवें दिन मनाया जाता है। ‘ईद-उल-जुहा’, यह नाम अधिकतर अरबी देशों में ही लिया जाता है, लेकिन भारतीय उप महाद्वीप में इस त्यौहार को इस दिन बकरे की कुर्बानी देने के कारण बकर-ईद कहा जाता है। अमूमन यह माना जाता है कि इस ईद का संबंध बकरे से है। लेकिन वास्तव में, ‘बकर’ का अर्थ है ‘बड़ा जानवर’, जो जिबह किया जाता है। ‘ईदे कुरबां’ का अर्थ है ‘बलिदान की भावना’। अरबी में ‘कर्ब’ नजदीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं। अर्थात्‌ इस अवसर पर अल्लाह इन्सान के करीब हो जाता है। वैसे इस ईद को और भी कई नामों से जाना जाता है। इसे ‘ईद-अल-अदहा’, ‘ईदु्ज्जोहा’ , ‘नमकीन ईद’, ‘ईदे कुरबां’ और ‘ईदे-अहा’ भी कहा जाता है।

Eid-ul Zuha का अर्थ है – Festival of sacrifice यानि बलिदान का पर्व। इस ईद का गहरा संबंध क़ुर्बानी से है। इस्लाम में बलिदान का बहुत अधिक महत्व है। कहा गया है कि अपनी सबसे प्यारी चीज रब की राह में खर्च करो। रब की राह में खर्च करने का अर्थ नेकी और भलाई के कामों में। ईद-उल-ज़ुहा के मौके पर मुस्लिम धर्म के लोग “अल्लाह के प्रति अपनी आस्था और वफादारी दिखाने” के लिए बकरे या अन्य जानवरों की कु़र्बानी देते हैं। यह एक जरिया है जिससे बंदा अल्लाह की रजा हासिल करता है। इस कुर्बानी में अल्लाह केवल कुर्बानी के पीछे बंदों की नीयत को देखता है। अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में अपना नेक तरीके से कमाया हुआ धन खर्च करे। कुर्बानी का सिलसिला ईद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक चलता है।

क्यों दी जाती है कुर्बानी (Story Behind Kurbani) –

वैसे केवल बकरे की ही नहीं, कुछ लोग ऊंट की कुर्बानी भी देते हैं। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है? खुशियों के त्यौहार में किसी बेज़ुबान जानवर की कुर्बानी देने का क्या अर्थ है? दरअसल इसके पीछे एक कहानी एवं उससे जुड़ी मान्यता छिपी है।

ईद-उल-जुहा का इतिहास हजरत इब्राहीम अलैय सलाम से जुड़ा है। हजरत इब्राहीम कई हजार साल पहले ईरान के शहर “उर” में पैदा हुए थे। जिस वातावरण में उन्होंने आंखें खोलीं, उस समाज में कोई भी बुरा काम ऐसा न था जो न हो रहा हो। उन्होंने आवाज उठाई तो कबीले वाले दुश्मन बन गए। उनका जीवन जनसेवा में बीता। 90 साल की उम्र में भी उनकी औलाद नहीं हुई तो खुदा से उन्होंने प्रार्थना की और उन्हें चांद सा बेटा “इस्माइल” मिल गया। इस्माइल की उम्र 11 साल भी न होगी कि हजरत इब्राहीम को एक सपना आया।




उन्हें ख्वाब में अल्लाह का हुक्म हुआ हुआ कि खुदा की राह में कुर्बानी दो। उन्होंने अपने प्यारे ऊंट की कुर्बानी दी। फिर सपना आया कि अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो। उन्होंने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। तीसरी बार वही सपना फिर आया। वह समझ गए कि अल्लाह को उनके बेटे की कुर्बानी चाहिए। यह हजरत इब्राहीम के लिए एक इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म। लेकिन अल्लाह का हुक्म ठुकराना अपने धर्म की तौहीन करने के समान था, जो हजरत इब्राहीम को कभी भी कुबूल ना था। इसलिए उन्होंने सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा करने का निर्णय बनाया और अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी हाजरा से कहा कि नहला-धुला कर बच्चे को तैयार करें।

जब वह इस्माइल को बलि के स्थान पर ले जा रहे थे तो इब्लीस (शैतान) ने उन्हें बहकाया कि- “क्यों अपने जिगर के टुकड़े को मारने पर तूले हो”, मगर वह न भटके। छुरी फेरने से पहले नीचे लेटे बेटे ने बाप की आंखों पर रुमाल बंधवा दिया कि कहीं ममता आड़े न आ जाए। अल्लाह रहीमो करीम है और वह तो दिल के हाल जानता है। जैसे ही हजरत इब्राहीम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से इस्माईल को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक मेमने को रख दिया। इस तरह हजरत इब्राहीम के हाथों मेमने के जिब्हा होने के साथ पहली कुर्बानी हुई। इसके बाद जिब्रील अमीन ने हजरत इब्राहीम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कुबूल कर ली है और अल्लाह आपकी कुर्बानी से राजी है।

कुर्बानी का मकसद –

इस्लाम के अनुसार अल्लाह दिलों के हाल जानता है और वह खूब समझता है कि बंदा जो कुर्बानी दे रहा है, उसके पीछे उसकी क्या नीयत है। जब बंदा अल्लाह का हुक्म मानकर महज अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करेगा तो यकीनन वह अल्लाह की रजा हासिल करेगा, लेकिन अगर कुर्बानी करने में दिखावा या तकब्बुर आ गया तो उसका करना व्यर्थ जाता रहेगा। कुर्बानी कभी भी इज्जत के लिए या दिखावे के लिए नहीं की जानी चाहिए, बल्कि इसे अल्लाह की इबादत समझकर किया जाना चाहिए। कुर्बानी का असली मतलब यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए दिया गया हो। परन्तु इस त्यौहार के दिन जानवरों की कुर्बानी महज एक प्रतीक है। असल कुर्बानी हर एक मुस्लिम को अल्लाह के लिए जीवन भर करनी होती है।

कौन करें कुर्बानी –

शरीयत के मुताबिक कुर्बानी हर उस औरत और मर्द के लिए वाजिब है, जिसके पास 13 हजार रुपए या उसके बराबर सोना और चांदी या तीनों (रुपया, सोना और चांदी) मिलाकर भी 13 हजार रुपए के बराबर है।

गर कुर्बानी नहीं दी –

ईद उल अजहा पर कुर्बानी देना वाजिब है। वाजिब का मुकाम फर्ज से ठीक नीचे है। अगर साहिबे हैसियत होते हुए भी किसी शख्स ने कुर्बानी नहीं दी तो वह गुनाहगार होगा। जरूरी नहीं कि कुर्बानी किसी महँगे जानवर की की जाए। हर जगह जामतखानों में कुर्बानी के हिस्से होते हैं, आप उसमें भी हिस्सेदार बन सकते हैं। अगर किसी शख्स ने साहिबे हैसियत होते हुए कई सालों से कुर्बानी नहीं दी है तो वह साल के बीच में सदका करके इसे अदा कर सकता है। सदका एक बार में न करके थोडा-थोडा भी दिया जा सकता है।

कुर्बानी का हिस्सा –

अल्लाह का नाम लेकर जानवर को क़ुर्बान किया जाता है। इसी क़ुर्बानी और गोश्त को हलाल कहा जाता है। कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से करने की शरीयत में सलाह है। गोश्त को तीन हिस्सों में बांट देते हैं। एक हिस्सा अपने पास रखते हैं, दूसरा सगे-संबंधियों तथा दोस्तों को और तीसरा हिस्सा गरीबों को दिया जाता है। तीन हिस्से करना जरूरी नहीं है, अगर खानदान बडा है तो उसमें दो हिस्से या ज्यादा भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। गरीबों में गोश्त तकसीम करना मुफीद है।

किस प्रकार के जानवर की कुर्बानी दी जाये –

काफी रोचक बात है, लेकिन कुर्बानी के लिए खासतौर पर जानवरों का चयन किया जाता है। बकरा या फिर ऊंट कुर्बान किए जा सकते हैं लेकिन वह किस रूप एवं अवस्था में हों, यह जान लेना बेहद जरूरी होता है। इसके भी कई नियम एवं कानून हैं, जिनका उल्लंघन करना आल्लाह के नियमों की तौहीन करने के समान है। इसलिए जानकारी के अनुसार, वह पशु कुर्बान नहीं किया जा सकता जिसमें कोई शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो या जो शारीरिक तौर से बिल्कुल दुबला-पतला हो। बहुत छोटे पशु की भी बलि नहीं दी जा सकती। कम-से-कम उसे दो दांत (एक साल) या चार दांत (डेढ़ साल) का होना चाहिए।

ईद-उल-जुहा कैसे मनाया जाता है –

बकरीद की तैयारी त्यौहार के कई दिनों पहले से आरम्भ हो जाती है। परिवार के सभी सदस्यों के लिए नए कपड़े खरीदे जाते हैं। इस त्यौहार में बकरे की बलि देने का विधान है। अतः बकरे खरीदे जाते हैं। इस दिन सभी लोग साफ-पाक होकर नए कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ते हैं। मर्दों को मस्जिद व ईदगाह और औरतों को घरों में ही पढ़ने का हुक्म है। नमाज़ पढ़कर आने के बाद ही कुरबानी की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। ईद उल फित्र की तरह ईद उल ज़ुहा में भी ज़कात देना अनिवार्य होता है ताकि खुशी के इस मौके पर कोई गरीब महरूम ना रह जाए। हर त्योहार पर ग़रीबों का ख़्याल ज़रूर रखा जाता है ताक‍ि उनमें कमतरी का एहसास पैदा न हो। यह त्यौहार दुनिया भर में मुसलमानों के बीच काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस तरह यह ईद जहाँ सबको साथ लेकर चलने का पैग़ाम देती है वहीं यह भी बताती है के इंसान को ख़ुदा का कहा मानने में, सच्चाई की राह में अपना सब कुछ क़ुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

वर्तमान में दिखावा होने लगा है पर्व

अपना मज़हबी फ़रीज़ा समझकर क़ुर्बानी करना चाहिए। जो ज़रूरी बातें ऊपर बताई गई हैं उनका ख्याल रखना चाहिए। लेकिन आजकल देखने में आ रहा है कि इसमें झूठी शान और दिखावा भी शामिल हो गया है। 15-20 हज़ार से लेकर लाख, दो लाख का बकरा ख़रीदा जाता है, उसे समाज में घुमाया जाता है ता‍कि लोग उसे देखें और उसके मालिक की तारीफ़ करें। इस दिखावे का क़ुर्बानी से कोई तआल्लुक़ नहीं है। क़ुर्बानी से जो सवाब एक मामूली बकरे की क़ुर्बानी से मिलता है वही किसी महँगे बकरे की क़ुर्बानी से मिलता है। अगर आप बहुत पैसे वाले हैं तो ऐसे काम करें जिससे ग़रीबों को ज़्यादा फ़ायदा हो।

एक बड़ा सवाल

एक बड़ा सवाल इस त्यौहार के खिलाफ यह है कि क्या किसी की बलि देकर, किसी को मारकर आप अपने ईश्वर को पा सकते हैं? बलि की परंपरा तो हिंदू धर्म में भी है पर इतनी बड़ी संख्या में शायद ही किसी पर्व में जानवरों को मारा जाता है। इस्लाम धर्म बहुत महान है जो वह गरीबों को अपनी हर खुशी का हिस्सा मानता है पर पशु भी तो अल्लाह के ही बनाए हुए हैं फिर उनकी कुर्बानी क्यूं। यह दुनिया शाकाहार से जितनी सुंदर दिखती है उतनी ही बदसूरत यह मांसाहर की वजह से लगती है।

खैर अगर यह परंपरा है तो इसे कायम रखना ही चाहिए। लेकिन इस परंपरा का दिखावा और इसे फैलाना नहीं चाहिए। हर जीव को जीने का अधिकार है जिसे छीना नहीं जाना चाहिए। बकरीद या ईद-उल-जुहा का मुख्य संदेश है कि आपको सच्चाई की राह पर कुछ भी न्यौछावर करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

।। CSC के सभी पाठकों को ईद-उल-जुहा (Eid Ul-Zuha) की हार्दिक शुभकामनाएं ।।

||Thank You||

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Chandan Saini

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