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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष : श्रीकृष्ण की जन्मकथा और उनके जीवन का सार

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जब-जब भी धरती पर धर्म का पतन हुआ है और धरती पर पाप और असुरों के अत्याचार बढ़े हैं तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। द्वापर में एक ऐसी ही विभूति ने भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में अवतरण लिया था, जिसे “कृष्ण” कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के आधार पर विष्णु भगवान ने 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में 8वें अवतार के रूप में देवकी के गर्भ से भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र में रात के ठीक 12 बजे जन्म लिया। ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। हिन्दू कालगणना के अनुसार 5126 वर्ष पूर्व कृष्ण का जन्म हुआ था।

कृष्ण क्या हैं? मनुष्य हैं, देवता हैं, योगी हैं, संत हैं, योद्धा हैं, चिंतक हैं, संन्यासी हैं, लिप्त हैं, निर्लिप्त हैं? क्या कोई परिभाषित कर सकता है? इतना बहुआयामी व्यक्तित्व, जो जन्म से ही मृत्यु के साये में जीता है। कृष्ण पर क्या लिखा जाये और कितना लिखा जाये? क्योंकि कृष्ण तो जगत का विस्तार हैं, चेतना के सागर हैं, अलौकिक है, सभी कलाओं में माहिर है। उन्हें शब्दों में बाँध पाना उतना ही मुश्किल है जितना की सागर की लहरों को अपनी बाहों में समेटना। उनके लिए कोई व्यापक परिभाषा नहीं बनाई जा सकती क्योंकि वो स्वमं अपने आप में प्रत्येक परिभाषाओं को समेटे हुए है। ग्वालों एवं बालाओं के साथ खेलने वाला सरल और साधारण सा कृष्ण इतना अगम्य है कि उसे जानने के लिए ज्ञानियों को कई जन्म लेने पड़ते हैं, तब भी उसे नहीं जान पाते। कृष्ण कई ग्रंथों के पात्र हैं। आज उन पर सैकड़ों ग्रंथ लिखे जा चुके हैं और तब भी लगता कि उन्हें तो किसी ने छुआ भी नहीं है। उन पर सैकड़ों वर्षों तक लिखने के बाद भी उनकी एक मुस्कान को ही परिभाषित नहीं किया जा सकता।

भगवान कृष्ण ने अवतार से लीला संवरण तक एक भी ऐसा कर्म नहीं किया जो मानवता के उद्धार के लिए न हो। कृष्ण चरित्र सबको लुभाता है। कृष्ण संपूर्ण जिंदगी के पर्याय हैं। कृष्ण का चरित्र व्यक्ति के सुखों एवं दुखों में आबद्ध है। राम का शैशव किसी को याद नहीं है, सिर्फ बालकांड तक सीमित है, लेकिन कृष्ण का बाल्यकाल हर घर की शोभा है। हर मां अपने बालक के बचपन की तुलना कृष्ण के बचपन से करती है। उनका घुटनों के बल चलना, पालने से नीचे गिरना, माखन के लिए जिद करना, माता को प्रति पल सताना हर घर का आदर्श है। उनका जीवन संदेश देता है कि जो भी पाना है, संघर्ष से पाना है। कृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान स्वरूप हैं। कृष्ण की लीलाएं बताती हैं कि व्यक्ति और समाज आसुरी शक्तियों का हनन तभी कर सकता है, जब कृष्णरूपी आत्म-तत्व चेतन में विराजमान हो। ज्ञान और भक्ति के अभाव में कर्म का परिणाम कर्तापन के अहंकार में संचय होने लगता है। सर्वात्म रूप कृष्णभाव का उदय इस अहंकार से हमारी रक्षा करता है। कृष्ण जीवनभर यताति रहे, भटकते रहे, लेकिन दूसरों का सहारा बने रहे। बाल लीलाएं करके गांव वालों को बहुत-सी व्याधियों से बचाया, दिखावे से दूर कर्मयोगी बनाया, बुरी परंपराओं से आजाद कराया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों के अनुसार कृष्ण सभी दृष्टि से पूर्णावतार हैं। आध्यात्मिक, नैतिक या दूसरी किसी भी दृष्टि से देखेंगे तो मालूम होगा कि कृष्ण जैसा समाज उद्धारक दूसरा कोई पैदा हुआ ही नहीं है। श्रीकृष्ण जन्म का घटना क्रम भी बड़ा विचित्र था। जन्म से ही जिसकी हत्या की बिसात बिछाई गई हो, जिसे जन्म से ही अपने माता-पिता से अलग कर दिया हो, जिसने अपना संपूर्ण जीवन तलवार की धार पर जिया हो, वो ही इतने विराट व्यक्तित्व का धनी हो सकता है। महान कार्य के लिए संसार में आने वाले हर संकट को नष्ट कर अपने उद्देश्य की ओर बढ़ते रहते हैं।

श्रीकृष्ण के अवतरण की कथा और संघर्ष :

द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। उसके अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे। कंस गोहत्या का प्रवर्तक था। उसके राज्य में नरबलि होती थी। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- “हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।” यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- “मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?” कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।  जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- “अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।” उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।

अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- “अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो जन्म ले चुका है और कही दूर पँहुच चुका है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।” यह है कृष्ण जन्म की कथा। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी। कृष्ण का पालन-पोषण यशोदा माता और नंद बाबा की देखरेख में हुआ। बस, उनके जन्म की खुशी में तभी से प्रतिवर्ष जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है।

कृष्ण के जन्म के साथ ही अनेक आसुरी शक्तियों ने उन्हें मारने की कोशिश की। सबसे पहले पूतना अपने वक्षस्थल पर विष लगा कर पहुंचती है परंतु वह भी समाप्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों कृष्ण बड़े हुए आपदाएं भी बढ़ती जाती हैं। अघासुर, बकासुर, त्रणावर्त, धेनुकासुर न जाने कितने असुर उन्हें मारने आते हैं पर सभी एक-एक कर समाप्त होते गए। कंस ने नया तरीका सोचा, धनुष यज्ञ का आयोजन रचा, अक्रूर जी को भेजा और श्रीकृष्ण को मथुरा बुला लिया वहीं यज्ञ शाला में मदमस्त कुबलियापीड़ हाथी तथा मुष्टिक एवं चाणूर पहवान उन पर टूट पड़े परंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें भी धराशायी कर दिया और कंस की छाती पर चढ़कर उसे भरी सभा में समाप्त कर अपने माता-पिता को उसकी कैद से मुक्त कराया और अपने नाना यानी कंस के पिता उग्रसेन के हाथों मथुरा की सत्ता सौंप कर भय और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। जरासंध 100 राजाओं का सिर काटकर शिवजी पर बलि चढ़ाने वाला था। कृष्ण ने इन दोनों आसुरी शक्तियों का संहार किया।

श्रीकृष्ण के अनुसार प्रेम की परिभाषा :

राधा-कृष्ण का प्रेम तो त्याग-तपस्या की पराकाष्ठा है। अगर ‘प्रेम’ शब्द का कोई समानार्थी है तो वो राधा-कृष्ण है। प्रेम शब्द की व्याख्या राधा-कृष्ण से शुरू होकर उसी पर समाप्त हो जाती है। राधा-कृष्ण के प्रेम में कभी भी शरीर बीच में नहीं था। जब प्रेम देह से परे होता है तो उत्कृष्ट बन जाता है और प्रेम में देह शामिल होती है तो निकृष्ट बन जाता है। रुक्मणि व कृष्ण की अन्य रानियों ने कभी भी कृष्ण और राधा के प्रेम का बहिष्कार नहीं किया। रुक्मणि राधा को तबसे मानती थीं, जब कृष्ण के वक्षस्थल में तीव्र जलन थी। नारद ने कहा कि कोई अपने पैरों की धूल उनके वक्षस्थल पर लगा दे, तो उनका कष्ट दूर हो जाएगा। कोई तैयार नहीं हुआ, क्योंकि भगवान के वक्षस्थल पर अपने पैरों की धूल लगाकर हजारों साल कौन नरक भोगेगा? लेकिन राधा सहर्ष तैयार हो गईं। उन्हें अपने परलोक की चिंता नहीं थी, कृष्ण की एक पल की पीड़ा हरने के लिए वह हजारों साल तक नरक भोगने को तैयार थी। उस समय तो रुक्मणि चमत्कृत थी, जब कृष्ण के गरम दूध पीने से राधाजी के पूरे शरीर पर छाले आ गए थे। कारण था कि राधा तो उनके पूरे शरीर में विद्यमान हैं। कृष्ण ने यौवन का पूर्ण आनंद लिया, जो संयमित था। उनकी उद्दीप्त मुरली की तान ने कभी भी मर्यादाओं की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। राधा के प्रति प्रेम तो अनन्य है लेकिन सभी अपनों के प्रति उनके प्रेम में कोई अलग भाव नहीं था। अपनी दोनों माताओं एवं पिताओं, अपनी रानियों, ग्वाल बालों, संगी-साथियों, ब्रज वनिताओं से भी कृष्ण उतने ही घनिष्ठ थे। उन्होंने रास रचाया, लेकिन रास है क्या? जब कोई मनोवेग इतना प्रबल हो जाए कि चुप न रह सके, चिल्ला उठे तो वह रास बन जाता है। उस महारास का मुख्य उद्देश्य था महिलाओं की जाग्रति। बेचारी महिलाएं अपने मन की बात कैसे करें। समाज का बंधन, परिवार का बंधन। उस महारास में ब्रज की महिलाओं ने अपने अस्तित्व को नई पहचान दी थी। कृष्ण की कुशलता थी कि उन्होंने सबको एक जैसा स्नेह दिया। पशु-पक्षी, शिक्षित-अशिक्षित, रूपवान-कुरूप सभी को समदृष्टि से देखा और अपने स्नेह से वश में कर लिया।

कृष्ण का भारतीय जनमानस पर अद्भुत प्रभाव है। जन्म से लेकर मोक्ष तक वो भारतीय जनमानस से जुड़े रहे। उनके चरित्र को लोग इतने निकट पाते हैं कि लगता है कि ये सब उनके घर में ही घटित हुआ हो। अपने पूरे जीवनकाल में वो भारतीय जनमानस का नेतृत्व करते हुए दिखाई देते हैं। बचपन में इन्द्र के अभिमान को चूर करके प्रकृति के स्वरूप गोवर्धन की पूजा करवाते हुए ग्रामीणजनों एवं किसानों का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं। अन्यायी कंस का वध करके पूरे परिवार एवं समाज को भयमुक्त बनाते हैं। गरीब सुदामा के प्रति उनका प्रेम समाज के दलित एवं शोषित वर्ग के उत्थान का प्रतिनिधित्व करता है। गीता का संबोधन समस्त मानव जाति को बुराइयों से बचने का संदेश है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं लेकिन कृष्ण की कोई एक उपाधि नहीं है। कृष्ण कहीं योगी, कहीं प्रेमी, कहीं योद्धा, कहीं युद्धभूमि से भागे रणछोड़, कहीं कूटनीतिज्ञ, कहीं भोले-भाले ग्वाले। मनुष्य जीवन के जितने रंग, जितने सद्गुण, जीवन जीने के जितने आदर्श और व्यावहारिक दृष्टिकोण हैं, वे सब कृष्ण में समाहित हैं। आसक्ति से अनासक्ति का भाव सिर्फ कृष्ण में है। आसक्ति और विरक्ति की पराकाष्ठा कृष्ण का जीवन है। मेघ की तरह बरसकर रीता हो चल दिया इसलिए कृष्ण भारतीय जनमानस के नायक हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व :

जिस स्थान पर ईश्वर या देवता अपनी दिव्य शक्ति के रूप में विराजमान होते हैं वह तीर्थ कहलाता है व उस स्थान को तीर्थ स्थान कहते हैं | इसी प्रकार जिस दिन परमेश्वर स्वयं अवतरित होते हैं वह दिन पूज्य, पवित्रता देने वाला व पर्वमय हो जाता है | श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को खासतौर पर सजाया जाता है। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान श्रीकृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन होता है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हम सभी व्रत रखकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं व पूज्य भावों से उपासना करते हैं | इस दिन केवल फल आहार किया जाता है | व्रत का अर्थ है की विश्राम की मुद्रा में न रहें | इस दिन लेटना नहीं है | बैठते हुए कुर्सी से पीठ लगाकर नहीं बैठना है | इस प्रकार शरीर की साधना की जाती है | शरीर को साधने से मन में दृढ़ता आती है व ईश्वर के प्रति आस्था के भाव दृढ होते हैं | मंदिरों में जाकर भजन कीर्तन में सम्मिलित होने से मन बुद्धि में पवित्रता आती है | जन्माष्टमी के दिन देश में अनेक जगह दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। दही-हांडी प्रतियोगिता में सभी जगह के बाल-गोविंदा भाग लेते हैं। कृष्ण के अवतरण दिवस को मोहरात्रि कहा जाता है। यह आसुरी वृत्तिरूपी बुराइयों से दूर रहने की रात है। आज हम इस जन्माष्टमी के पर्व पर संकल्पित होकर उनके चरित्र के कुछ अंशों व कुछ आदर्शों को अपने जीवन में निहित करें।

ईश्वर का ध्यान सदा ही कल्याणकारी है | श्री कृष्ण कर्म मार्ग पर आचरण करने के लिए कहते हैं | अपने अपने धर्म में रहते हुए कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के लिए कहते हैं। योगेश्वर श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं आत्माओं में उत्तम (परमात्मा) हूँ | इसलिए पुरुषोतम हूँ | मैं अविद्या (अज्ञान का वह अंधकार जो है ही नहीं) से अत्यंत परे सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा हूँ | अर्थात जो स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं। यशोदा नंदन, देवकी पुत्र भारतीय समाज में कृष्ण के नाम से सदियों से पूजे जा रहे हैं। तार्किकता के धरातल पर कृष्ण एक ऐसा एकांकी नायक हैं, जिसमें जीवन के सभी पक्ष विद्यमान है। कृष्ण वो किताब हैं जिससे हमें ऐसी कई शिक्षाएं मिलती हैं जो विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक सोच को कायम रखने की सीख देती हैं। समस्त शक्तियों के अधिपति युवा कृष्ण महाभारत में कर्म पर ही विश्वास करते हैं। कृष्ण का मानवीय रूप महाभारत काल में स्पष्ट दिखाई देता है। गोकुल का ग्वाला, बिरज का कान्हा धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों के मायाजाल से दूर मोह-माया के बंधनों से अलग है। कंस हो या कौरव-पांडव, दोनो ही निकट के रिश्ते फिर भी कृष्ण ने इस बात का उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों की बजाय कर्तव्य को महत्व देना आवश्यक है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कर्म प्रधान गीता के उपदेशों को यदि हम व्यवहार में अपना लें तो हम सब की चेतना भी कृष्ण सम विकसित हो सकती है।

कृष्ण का जीवन दो छोरों में बंधा है। एक ओर बांसुरी है, जिसमें सृजन का संगीत है, आनंद है, अमृत है और रास है। तो दूसरी ओर शंख है, जिसमें युद्ध की वेदना है, गरल है तथा निरसता है। ये विरोधाभास ये समझाते हैं कि सुख है तो दुःख भी है। यशोदा नंदन की कथा किसी द्वापर की कथा नही है, किसी ईश्वर का आख्यान नही है और ना ही किसी अवतार की लीला। वो तो यमुना के मैदान में बसने वाली भावात्मक रुह की पहचान है। यशोदा का नटखट लाल है तो कहीं द्रोपदी का रक्षक, गोपियों का मनमोहन तो कहीं सुदामा का मित्र। हर रिश्ते में रंगे कृष्ण का जीवन नवरस में समाया हुआ है। माखन चोर श्रीकृष्ण के जन्म दिवस पर मटकी फोड़ प्रतियोगिता को हम खेल खेल में एक उपदेश के तौर पर समझ सकते है कि किस तरह स्वयं को संतुलित रखते हुए लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है; क्योंकि संतुलित और एकाग्रता का अभ्यास ही सुखमय जीवन का आधार है। सृजन के अधिपति, चक्रधारी मधुसूदन का जन्मदिवस उत्सव के रूप में मनाकर हम सभी में उत्साह का संचार होता है और जीवन के प्रति सृजन का नजरिया जीवन को खुशनुमा बना देता है।

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Chandan Saini

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